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भीलवाड़ा

चाइनीज लाइटों के दौर में कुम्हारों का संघर्ष, बना रहे मिट्टी के दीये

-  सीजन की शुरुआत रही थोड़ी मंदी  - दीपोत्सव की तैयारियां हुई तेज

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लोकजीवन संवाददाता

02 नवम्बर 2026, 01:06 PM 3 मिनट में पढ़ें

चाइनीज लाइटों के दौर में कुम्हारों का संघर्ष, बना रहे मिट्टी के दीये

 भीलवाड़ा लोकजीवन न्यूज।  रोशनी और खुशियों का महापर्व दीपावली इस वर्ष 8 नवंबर को मनाया जाएगा, जबकि पांच दिवसीय दीपोत्सव पर्व की शुरुआत 6 नवंबर को धनतेरस के पावन पर्व के साथ हो जाएगी। पर्व को लेकर शहर के बाजारों से लेकर गली-मौहल्लों तक में जबरदस्त उत्साह और चहल-पहल देखने को मिल रही है। लोग अपने घरों और प्रतिष्ठानों को सजाने के लिए बाजारों में खरीदारी करने पहुंच रहे हैं। एक तरफ जहां आधुनिक चकाचौंध और सजावटी सामानों से बाजार अटे पड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ माटी की सोंधी खुशबू के साथ अपने पुश्तैनी हुनर को जिंदा रखने वाले कुम्हारों के चेहरों पर इस बार उम्मीद और चिंता की मिली-जुली लकीरें साफ देखी जा सकती हैं।
मौसम की मार से मंदा रहा शुरुआती कारोबार

मिट्टी कला से जुड़े स्थानीय कारीगर मन्नू प्रजापत ने लोकजीवन से बातचीत करते हुए बताया कि उनका यह व्यवसाय पूरी तरह से पुश्तैनी है, जिसके जरिए वे मिट्टी के दीये, कुल्हड़ और अन्य पारंपरिक बर्तन तैयार करते हैं। हालांकि, इस बार त्योहारी सीजन से करीब डेढ़-दो महीने पहले ही काम शुरू हो जाता है, लेकिन इस वर्ष मानसून कमजोर रहने और मौसम के उतार-चढ़ाव के कारण सीजन की शुरुआत थोड़ी मंदा रही। कारीगरों का कहना है कि शहरवासियों से उनकी यही अपील है कि वे चीनी या विदेशी वस्तुओं के बजाय अधिक से अधिक दीये जलाएं, जिससे उनके इस पैतृक रोजगार को संबल मिल सके।
महंगाई की दोहरी मार, बढ़ गई लागत
पारंपरिक कुम्हारों के सामने इस समय महंगाई की दोहरी मार है। दीये बनाने के लिए आवश्यक मिट्टी अब शहर के आसपास के तालाबों या मांडल क्षेत्र से मंगवानी पड़ती है, जिसके परिवहन और ढुलाई का खर्च काफी बढ़ गया है। कारीगरों के मुताबिक, एक ट्रैक्टर मिट्टी का खर्च अब 4 से 5 हजार रुपये तक पहुंच गया है। इसके अलावा चाक चलाने, पकाने और अन्य साधनों में भी लागत लगातार बढ़ रही है। इस बढ़ती महंगाई के मुकाबले उन्हें अपने उत्पादों की सही और उचित कीमत बाजार में नहीं मिल पा रही है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पर असर पड़ रहा है।
प्लास्टिक और डिस्पोजेबल से बढ़ रहा पर्यावरण पर संकट
कुम्हार समाज का कहना है कि आज के दौर में चाय और अन्य के लिए प्लास्टिक या कागज के डिस्पोजेबल गिलासों का चलन तेजी से बढ़ रहा है, जो न केवल उनके पारंपरिक कुल्हड़ों के रोजगार को खत्म कर रहा है, बल्कि शरीर और पर्यावरण के लिए भी नुकसानदेह है। यदि लोग चाय पीने के लिए कुल्हड़ और दीये जैसे स्वदेशी विकल्पों को अपनाएं, तो इससे पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा और कुम्हारों का रोजगार भी फले-फूलेगा।
वोकल फॉर लोकल का आह्वान
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकल फॉर लोकल और वोकल फॉर लोकल के विजन को आगे बढ़ाते हुए स्थानीय कारीगरों ने आमजन से पुरजोर अपील की है कि वे इस दीपावली पर विदेशी या चाइनीज लाइटों के स्थान पर देश के ही कारीगरों द्वारा बनाए गए दीयों का अधिक से अधिक उपयोग करें। जब देश का हर नागरिक अपने घर को स्वदेशी माटी के दीयों से रोशन करेगा, तभी इन मेहनतकश कुम्हारों के घरों में भी सच्ची दीपावली की रोशनी पहुंच सकेगी और उनका पुश्तैनी रोजगार सुरक्षित रह पाएगा।

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