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राजसमंद लोकजीवन । उदयपुर जिले से 40 किलोमीटर दूर मेणार गांव में बुधवार को बारूद से होली खेली गई। जहां प्रदेश भर में मंगलवार को लोगों ने गुलाल और फूलों से होली खेली तो वहीं बुधवार जमराबीच के अवसर मेणार गांव में बंदूक और तोप के साथ बारूद से होली खेली गई।. इस बारूद वाली होली को लेकर गांव वालों को सालभर बेसब्री से इंतजार रहता है। बारूद वाली होली देखने के लिए दूर-दूर से बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं। मेनार गांव की बारूद वाली होली इतिहास के उस कहानी को बयां करती है जिसमें यहां के मेनारिया ब्राह्मण समाज के लोगों ने मुगलों को मुंहतोड़ जवाब दिया था. स्थानीय लोगों के अनुसार आज से करीब 500 वर्ष पूर्व होली के बाद जमरा बीज के दिन गांव के मेनारिया ब्राह्मण समाज के रणबांकुरों ने शौर्य और वीरता का परिचय देते हुए मुगलों की सेना को शिकस्त दी थी। इस विजयी जोश और उत्साह में इस अनूठी होली का आयोजन किया जाता है. इस दिन शाम ढलने के साथ ही गांव में होली की तैयारियां परवान चढऩे लगती हैं. मेनार गांव में मेनारिया समाज के लोग अपने हाथों में गोला-बारूद के साथ होली खेलना शुरू कर देते हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार इस गांव में पिछले 500 साल से इस परंपरा जारी है। .
मेनार में बारूद वाली होली का इतिहास
स्थानीय निवासी मांगीलाल लुणावत ने बताया कि महाराणा प्रताप ने मुगलों से संघर्ष के लिए हल्दीघाटी के युद्ध की शुरुआत हुई थी. ऐसे में प्रताप ने मेवाड़ के हर व्यक्ति को त्याग और स्वाभिमान से जोड़ते हुए शौर्य और स्वाभिमान की अलख जगह थी।इसके बाद में अमर सिंह के नेतृत्व में मुगलो की चौकिया पर हमले किए जा रहे थे।.मेनार गांव के पास मुगलों की एक छावनी हुआ करती थी. ऐसे में मुगलों की छावनी का जो अत्याचार था, इससे मुक्ति पाने के लिए होली के बाद जमरा बीज के दिन गांव की सभी महिलाएं होली का ढुट निकालने के लिए होलीथडा गई हुई थी और पिछे से मधु श्याम मेनारिया के नेतृत्व में 500 ब्राह्मण समाज के लोगों ने मुगलों की छावनी पर भीषण आक्रमण करते हुए छावनी को ध्वस्त करते हुए मुगलों को यहां से खदेड़ दिया था।. बाद में जो जीत हासिल हुई थी, उस जीत के जोश में हर वर्ष मेनार की अनूठी होली खेली जाती है। आज भी मेनारिया ब्राह्मण समाज की महिलाएं बारूद वाली होली के समय चौराहा है पर नहीं आती है अपने घरों में रहती है। इस चीज के बाद मेवाड़ के महाराणा ने 16 उमराव के बाद 17 वे उमराव की उपाधि मेनारिया ब्राह्मण समाज को दी जो परंपरा आज भी चली आ रही है।
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