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श्रीलंका: 'क्रूरतापूर्ण' दुर्व्यवहार व यौन हिंसा के वर्षों बाद भी, पहुँच से दूर है न्याय
By Lokjeewan Daily - 15-01-2026

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने चिन्ता जताई है कि श्रीलंका में हिंसक टकराव के दौरान यौन हिंसा के जिन मामलों को अंजाम दिया गया था, उनसे अब भी पूरी तरह से निपटा नहीं जा सका है, और लम्बा समय बीत जाने के बावजूद, पुरुष व महिला भुक्तभोगियों के लिए न्याय को नकारा जा रहा है. श्रीलंका में कई दशकों तक जारी रहे गृहयुद्ध का क़रीब 15 वर्ष पहले अन्त हो गया था, मगर हज़ारों पीड़ित और उनके परिवार अब भी मानवाधिकार उल्लंघन मामलों के लिए न्याय पाने की कोशिश कर रहे हैं. इनमें 1980 के दशक से 2009 तक यौन हिंसा, लोगों को जबरन ग़ायब कर दिए जाने समेत अधिकार हनन के हज़ारों अन्य मामले हैं.2009 में हिंसक टकराव का अन्त हो जाने के बावजूद, बड़ी संख्या में यौन हिंसा के भुक्तभोगी अब भी शारीरिक घावों, नि:संतानता, मनोवैज्ञानिक झटकों, आत्मघाती विचारों की पीड़ा को झेल रहे हैं. Tweet URL

 

यूएन कार्यालय की नई रिपोर्ट, पिछले एक दशक के दौरान मानवाधिकार टीम द्वारा की गई निगरानी व जुटाई गई जानकारी पर आधारित है. इसके लिए इस पीड़ा से गुज़रने वाले व्यक्तियों, लिंग-आधारित हिंसा पर स्थानीय विशेषज्ञों, नागरिक समाज व अन्य हितधारकों से बात की गई.रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि घरेलू स्तर पर जवाबदेही को आगे बढ़ाने और सुधारों को लागू करने के लिए यह ज़रूरी है कि श्रीलंका सरकार इस मुद्दे पर विशेष रूप से अपने संकल्प का पालन करे.हिंसक टकराव के दौरान यौन हिंसा को, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का गम्भीर उल्लंघन माना जाता है और इसे युद्ध अपराध व मानवता के विरुद्ध अपराधों की श्रेणी में रखा जा सकता है.'स्तब्धकारी क्रूरता'भुक्तभोगियों ने बलात्कार, यौन विकृति, जबरन नग्नता, और सार्वजनिक अपमान समेत दुर्व्यवहारों की स्तब्धकारी क्रूरता को बयाँ किया है. बहुत से पीड़ितों का मानना है कि उन्हें गहरा सदमा पहुँचाने और समुदायों को तोड़ने के लिए ऐसे हमलों को अंजाम दिया गया.एक भुक्तभोगी ने बताया: “यौन हिंसा एक ऐसी यातना है जोकि कभी नहीं रुकती है.”रिपोर्ट के अनुसार, यह सदमा भुक्तभोगियों के परिवारों को भी है और बलात्कार की वजह से जन्मे बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है. चुप रह जाने, भय और सदमे से न उबर पाने की वजह से ये समुदाय अब भी टूटे हुए हैं. जीवित बचे व्यक्तियों और उनके प्रतिनिधियों ने बताया कि किस तरह से उनकी निगरानी की गई, डराया-धमकाया गया और उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ा. ये मामले उनके लिए कथित कलंक की भी वजह बने जबकि कारगर उपाय नदारद थे.समर्थन का अभावरिपोर्ट दर्शाती है कि सैन्यीकरण, आपात परिस्थितियों के लिए बने क़ानूनी फ़्रेमवर्क के इस्तेमाल, दंडहीनता की भावना और कमज़ोर क़ानून व्यवस्था से एक ऐसा माहौल बना, जिसमें यौन हिंसा समेत लिंग-आधारित हिंसा के अन्य मामलों को अंजाम दिया जाना जारी रहा. OHCHR की रिपोर्ट के अनुसार, मानवाधिकार उल्लंघन के इन मामलों और युद्ध अपराधों में जवाबदेही, ऐसी घटनाओं की शिनाख़्त और उसकी भरपाई के लिए समर्थन का अभाव था. इससे दोषियों के लिए दंडहीनता की विरासत पैदा हुई और यह आज भी पीड़ितों के जीवन को प्रभावित कर रही है.इसके मद्देनज़र, यूएन कार्यालय ने ध्यान दिलाया है कि श्रीलंका का यह क़ानूनी दायित्व है कि ऐसे उल्लंघन मामलों की रोकथाम, समुचित जाँच हो, दोषियों को न्याय के कटघरे में लाया जाए और भुक्तभोगियों के लिए मुआवज़े की व्यवस्था हो. सुधारों व सेवाओं पर बलयूएन कार्यालय ने श्रीलंकाई सरकार से आग्रह किया है कि सरकारी बलों और अन्य पक्षों द्वारा अतीत में यौन हिंसा के जिन मामलों को अंजाम दिया गया था, उन्हें स्वीकारा जाए और उनके लिए औपचारिक रूप से माफ़ी मांगी जाए.इसके अलावा, सुरक्षा सैक्टर, न्यायपालिक व क़ानूनी फ़्रेमवर्क में सुधार लागू किए जाने होंगे, एक स्वतंत्र अभियोजन कार्यालय को स्थापित किया जाना होगा और मनोवैज्ञानिक व सामाजिक समर्थन सेवाओं की सुलभता सुनिश्चित करनी होगी.यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने कहा कि यौन हिंसा के भुक्तभोगियों की गरिमा बहाल करने, और श्रीलंका में आपसी मेलमिलाप के लिए यह ज़रूरी है कि ऐसे मामलों को स्वीकारा जाए, और उनकी सच्चाई, जवाबदेही व क्षतिपूर्ति के लिए प्रयास किए जाएं.

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