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परेश कुमार शर्मा की पुस्तक ‘‘ फुटप्रिंट्स इन द फॉरेस्ट्स’’ सुरक्षा एवं संरक्षण की प्रेरणा स्त्रोत बनी
By Lokjeewan Daily - 13-07-2026

जयपुर। भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा की मिट्टी में पले-बढ़े सेवानिवतृत आईएफएस परेश कुमार शर्मा ने भारतीय वन सेवा में 36 वर्षों तक जंगलों, वन्यजीवों और पर्यावरण की रक्षा करते हुए जो संघर्ष, साहस और अनुभव अर्जित किए, वे अब पुस्तक ‘जंगलों में पदचिह्न एक वन अधिकारी के संस्मरण’ के रूप में दुनिया के सामने आए हैं। खास बात यह है कि पुस्तक ‘‘ फुटप्रिंट्स इन द फॉरेस्ट्स’’ के लोकार्पण के कुछ ही समय बाद इसने ऑनलाइन मंच ड्डद्वड्ड5शठ्ठ पर पर्यावरण एवं प्रकृति श्रेणी की शीर्ष 10 सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तकों में जगह बनाकर नई उपलब्धि हासिल कर ली।
यह किताब केवल संस्मरण नहीं, बल्कि संघर्ष, ईमानदारी और जुनून की जीवंत दास्तान है। पुस्तक में परेश कुमार शर्मा ने बचपन की यादों से लेकर प्रशासनिक सेवा के कठिन सफर तक हर को बेबाकी से दर्ज किया है। उन्होंने उन चुनौतियों को भी उजागर किया है, जिनका सामना उन्हें जंगलों में अवैध कटाई रोकने, वन संपदा की तस्करी पर लगाम लगाने, अतिक्रमण हटाने और वन्यजीवों की सुरक्षा के दौरान करना पड़ा। कई बार परिस्थितियाँ इतनी विकट रही कि जान का जोखिम भी उठाना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने कर्तव्य से कभी समझौता नहीं किया। पुस्तक का सबसे मजबूत पक्ष इसकी सच्चाई और निर्भीकता है। इसमें सरकारी तंत्र की जमीनी हकीकत, फाइलों की जटिलता, निर्णय प्रक्रिया की चुनौतियाँ और एक ईमानदार अधिकारी के सामने आने वाले दबावों का बिना लाग-लपेट चित्रण किया गया है। यही कारण है कि पुस्तक को पढऩे वाले वरिष्ठ अधिकारियों ने इसे बेहद प्रेरक और मार्गदर्शक बताया है। 
बेगमपेट स्थित आईएएस एसोसिएशन भवन में विशेष लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी प्रियदर्शी दास ने कहा कि लेखक परेश कुमार शर्मा निडर, ईमानदार और संवेदनशील प्रशासक हैं। संस्मरण में उनकी व्यक्तिगत और सेवाकालीन चुनौतियों, प्रकृति प्रेम और संरक्षण के प्रति समर्पण का जीवंत चित्रण है । पुस्तक विभागों के लिए मार्गदर्शिका साबित हो सकती है। सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी श्रीपाद भालेराव ने कहा कि यह संस्मरण बेबाक और तथ्याधारित है, आत्मप्रशंसा से परे है। लेखक ने वनों की तस्करी, अतिक्रमण रोकने और फाइलों की प्रगति का तिथिवार ब्यौरा देकर विभागीय सुधार के प्रयास दर्शाए हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में वन विभाग के लिए यह महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। पूर्व विशेष मुख्य सचिव बी. पी. आचार्य ने कहा कि यह पुस्तक न केवल पर्यावरण प्रेमियों और नए सिविल सेवकों के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय है, बल्कि देश में वनों के संरक्षण के लिए नयी दिशा दे सकती है।
सेवानिवृत्त पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक सी. मधुकर राज ने लेखक की 36 वर्षों की सेवायात्रा का उल्लेख करते हुए आदिलाबाद, करीमनगर, वरंगल, खम्मम जैसे नक्सल प्रभावित, जैव विविधता वाले क्षेत्रों में संरक्षण, तस्करी रोधी कार्रवाई और बाद में मुख्यालय में विजिलेंस, जियोमैटिक्स, फॉरेस्ट कवर मैपिंग व रिपोर्ट तैयारियों में योगदान को रेखांकित किया। डॉ. मार्गरेट फ्रांसिस ने पुस्तक को आत्मकथात्मक, प्रेरक और प्रामाणिक बताते हुए कहा कि नौकरशाही बाधाओं के बीच दृढ़ता, नैतिकता और लोकसेवा के मूल्यों के लिए यह पुस्तक विद्यार्थियों और सिविल सेवा अभ्यर्थियों के लिए प्रेरणादायी पठन होगी। लेखक परेश कुमार शर्मा ने कहा कि उनके समक्ष अपने संस्मरणों को कलमबद्ध करने के पीछे वनों के संरक्षण के प्रति जागरूकता लाना ही मुख्य उद्देश्य है । समाज को यह समझना होगा कि वनों कि सुरक्षा एवं संरक्षण बहुत ज़रूरी है।
शाहपुरा के लिए यह उपलब्धि किसी सम्मान से कम नहीं। एक ऐसे समय में, जब पर्यावरण संरक्षण वैश्विक चिंता का विषय है। शाहपुरा के बेटे ने अपने अनुभवों को शब्द देकर समाज को नई दिशा देने का प्रयास किया है। परेश शर्मा की यह सफलता शाहपुरा के युवाओं को साफ संदेश देती है-मंजिल बड़ी हो तो छोटे शहर कभी बाधा नहीं बनते, बल्कि वही सबसे मजबूत पहचान बनते हैं।

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