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शिवसेना (यूबीटी) ने मंगलवार को दावा किया कि सुनियोजित तरीके से दल-बदल, कथित तौर पर ईवीएम को नष्ट करने, संस्थाओं की चुप्पी और जनता का ध्यान भटकाने जैसी घटनाओं के बीच भारत की लोकतांत्रिक और राजनीतिक व्यवस्था में चिंताजनक 'गिरावट' आई है, जो तानाशाही की ओर बढ़ने के संकेत हैं। शिवसेना (यूबीटी) ने पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के एक संपादकीय में कहा कि दल बदलने वाले विधायकों और सांसदों की खबरों ने भारत के टीवी चैनलों और अखबारों पर पूरी तरह कब्जा कर लिया है। जहां चार हजार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के जलने पर न्यूज चैनलों पर कोई बहस नहीं हुई, वहीं शिवसेना की बैठक में एक सांसद के शामिल न होने को राष्ट्रीय चर्चा का मुद्दा बनाकर सनसनीखेज बना दिया गया। तानाशाही सरकारों में दुनिया भर में ठीक ऐसा ही होता है, बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए रोज नए विवाद खड़े किए जाते हैं। पार्टी ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर 'अफवाहों का चोर बाजार' बनने का आरोप लगाया। पार्टी ने कहा कि इस बाजार से निकलने वाली अफवाहों को ही वे विकास कहते हैं। हाल ही में उन्होंने यह अफवाह फैलाई कि 'प्रधानमंत्री मोदी सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले प्रधानमंत्री हैं'। हालांकि, वे उस सच्चाई पर पूरी तरह चुप रहे, जो कोई अफवाह नहीं थी कि अयोध्या राम मंदिर से पांच करोड़ रुपए का गबन किया गया था।
पार्टी ने कहा, "प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी हमले में मारे गए तीन भारतीय नाविकों की मौत पर दुख भी नहीं जता पाए। इसके बजाय, वे फ्रांस के दौरे पर चले गए, जबकि उन नाविकों के शव ओमान के एक बंदरगाह पर सड़ रहे हैं। भारतीय नागरिकों के शवों का यह अपमान बेहद चिंताजनक है।"
संपादकीय में तर्क दिया गया कि जब ये दुखद घटनाएं हो रही हैं, तब भी भाजपा दूसरी राजनीतिक पार्टियों के विधायकों और सांसदों को तोड़ने का अपना लगातार अभियान चला रही है। भाजपा ममता बनर्जी द्वारा स्थापित तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का नामोनिशान मिटाने पर आमादा दिखती है। नतीजतन, टीएमसी के विधायक और सांसद रोज पार्टी छोड़ रहे हैं।
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी सरकारें विपक्षी दलों को तोड़ने के अपने अहंकारी हमले को रोकने का कोई संकेत नहीं दे रही हैं। पार्टी ने टिप्पणी की, "भाजपा और उसके साथी डींगें मार रहे हैं कि हमने तृणमूल को तोड़ा, और अब हम शिवसेना को भी फिर से तोड़ देंगे। वे इसे 'ऑपरेशन टाइगर' कह रहे हैं।"
संपादकीय में कहा गया कि भाजपा के शासनकाल में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के स्पीकर असल में दसवीं अनुसूची को लपेटकर आग में फेंक रहे हैं। पार्टी बदलने वाले नेता खुलेआम स्पीकर के पास जाकर कहते हैं, "हम अलग हो गए हैं, हमें मान्यता दें," और स्पीकर भी इन गैर-कानूनी कामों में खुलेआम शामिल होते दिखते हैं। यहां तक कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट भी गद्दारों के रक्षक के तौर पर काम करते दिख रहे हैं।
ठाकरे गुट ने दावा किया कि भाजपा का मकसद देश में एक ही पार्टी का शासन थोपना है। उनका असली मकसद लोकतंत्र को खत्म करना, संविधान बदलना, और तानाशाही वाली राष्ट्रपति प्रणाली लागू करना है।
उन्होंने कहा, "उनका मकसद राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों को खत्म करना और देश की विविधतापूर्ण राजनीतिक संस्कृति को नष्ट करना है, और यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है। इसका मतलब है कि आगे चलकर चुनाव नहीं होंगे और राष्ट्रपति सीधे अपनी कैबिनेट नियुक्त करेंगे। देश तेजी से शासन की इस प्रणाली की ओर बढ़ रहा है।"
ठाकरे गुट ने कहा, "सरकार देश के गंभीर संकटों, जैसे भारी महंगाई, परीक्षा के पेपर लीक होना, बढ़ती बेरोजगारी, रुपये की गिरती कीमत और महिलाओं के खिलाफ अत्याचार पर सोची-समझी चुप्पी साधे हुए है, जबकि देश की राजनीति पर 'विकास' के नाम पर किए गए सुनियोजित राजनीतिक दलबदल का दबदबा बना हुआ है।"
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