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मेरा नाम जोकर: समय ने पहले ठुकराया, आज राज कपूर की अमर विरासत है
By Lokjeewan Daily - 02-09-2026

बेकारी के आलम में घर बैठे लगातार टीवी देखते-देखते अचानक ‘इंडियन आइडल’ के सीजन 15 का एपिसोड 16 सामने आया, जो हिंदी सिनेमा के महान शोमैन राज कपूर की जन्मशती को समर्पित था। मंच पर उनकी फिल्मों के गीत गूंज रहे थे और प्रतियोगी उनकी कालजयी धुनों को अपनी आवाज दे रहे थे। कार्यक्रम देखते-देखते मन बार-बार उस कलाकार की ओर लौटता रहा, जिसने सिनेमा में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इंसान की खुशियों, दुखों, सपनों और असफलताओं को भी जगह दी।
इसी दौरान ‘मेरा नाम जोकर’ याद आ गई—वह फिल्म जिसे कभी राज कपूर की सबसे बड़ी व्यावसायिक विफलताओं में गिना गया, लेकिन समय बीतने के साथ वही हिंदी सिनेमा की कालजयी कृतियों में शामिल हो गई। सवाल यही है कि किसी फिल्म का फैसला क्या केवल उसके बॉक्स ऑफिस से किया जा सकता है? अगर ऐसा होता तो ‘मेरा नाम जोकर’ शायद एक महंगी और असफल फिल्म बनकर रह जाती। लेकिन सिनेमा का इतिहास हमेशा बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से नहीं लिखा जाता।
18 दिसंबर 1970 को प्रदर्शित हुई ‘मेरा नाम जोकर’ ने राज कपूर को वह सफलता नहीं दी जिसकी उन्हें उम्मीद थी। मगर आज राजू का जोकर केवल सर्कस का कलाकार नहीं, बल्कि उस हर इंसान का प्रतीक लगता है जो दुनिया के सामने मुस्कुराता है और भीतर अपनी लड़ाई लड़ता रहता है।

‘मेरा नाम जोकर’ राज कपूर के लिए सामान्य फिल्म नहीं थी। इसे पूरा करने में उनके लगभग छह वर्ष लगे। पटकथा ख्वाजा अहमद अब्बास ने लिखी थी और कहानी राजू नाम के एक जोकर के इर्द-गिर्द बुनी गई थी। राज कपूर ऐसे कलाकार की जिंदगी दिखाना चाहते थे, जो दूसरों को हंसाता है, लेकिन खुद प्रेम, बिछोह और अकेलेपन से गुजरता है। फिल्म को उनके अपने जीवन और कलाकार के रूप में अनुभवों की छाया वाली रचना भी माना जाता है।
फिल्म का कैनवास बेहद विशाल था। राजू के जीवन को अलग-अलग चरणों में दिखाया गया और उसके प्रेम तथा रिश्तों के जरिए उसके व्यक्तित्व का विकास सामने आया। लगभग चार घंटे आठ मिनट लंबी इस फिल्म में दो अंतराल थे। उस दौर के हिंदी सिनेमा में इतनी लंबी और गंभीर फिल्म बनाना बड़ा जोखिम था।
राज कपूर से दर्शक ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ जैसी फिल्मों वाले सहज, मनोरंजक और आम आदमी के किरदार की उम्मीद करते थे। इसके विपरीत ‘मेरा नाम जोकर’ जीवन, प्रेम, अकेलेपन और मृत्यु जैसे गंभीर सवालों से जूझती फिल्म थी।

18 दिसंबर 1970 को फिल्म रिलीज हुई तो राज कपूर के नाम के साथ दर्शकों की बड़ी अपेक्षाएं भी थीं। लेकिन पर्दे पर उन्हें एक ऐसा राज कपूर दिखाई दिया जो जीवन और अकेलेपन जैसे गंभीर विषयों के बीच अपने किरदार की तलाश कर रहा था।
फिल्म में सर्कस की भव्यता, बड़े दृश्य, लोकप्रिय कलाकार और मजबूत संगीत था, लेकिन कहानी सीधे मनोरंजन की दिशा में नहीं जाती थी। चार घंटे से अधिक की लंबाई और गंभीर विषयवस्तु ने दर्शकों के लिए इसे कठिन अनुभव बना दिया। नतीजा यह हुआ कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं हो सकी और राज कपूर के करियर की बड़ी व्यावसायिक निराशाओं में शामिल हो गई।

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