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महिलाओं ने की गोवंश की पूजा, बाजरे की रोटी और अंकुरित अनाज का लगाया भोग
By Lokjeewan Daily - 08-09-2026

- समूह में बैठकर सुनी पारंपरिक व्रत कथाएं  
- जिले में धूमधाम से मनाया बछबारस पर्व
भीलवाड़ा लोकजीवन। जिले में मंगलवार को गोमाता के संरक्षण, संतान की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि का प्रतीक बछ बारस (गोवत्स द्वादशी) का पर्व पारंपरिक श्रद्धा, हर्षोल्लास एवं धार्मिक वातावरण में धूमधाम से मनाया गया। सुबह से ही समूचा शहर और ग्रामीण अंचल उत्सवमय नजर आया। महिलाओं ने पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में सज-धजकर गाय और बछड़े का विधि-विधान से पूजन किया तथा अपने परिवार की खुशहाली एवं बच्चों की लंबी उम्र की कामना की। सुबह तडक़े से ही मोहल्लों, गोशालाओं और गो-स्टैंड्स पर महिलाओं की भीड़ जुटने लगी थी। महिलाओं ने गाय और बछड़े को तिलक लगाकर रोली, अक्षत, मोगरा और फूलों की मालाएं पहनाईं। इसके बाद गोमाता को बाजरे की सोगरी (रोटी), गुड़ और विशेष रूप से अंकुरित अनाज जैसे चना, मूंग व मोठ का भोग लगाया गया। कई स्थानों पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से एकत्रित होकर बछ बारस की पारंपरिक व्रत कथाएं और लोक कहानियां सुनीं।
चाकू से कटी चीजों का रहा परहेज
पर्व के कड़े नियमों का पालन करते हुए व्रत रखने वाली महिलाओं ने पूरे दिन चाकू या धारदार हथियार से कटी हुई किसी भी वस्तु का सेवन नहीं किया। इसके साथ ही भोजन में गेहूं और गाय के दूध, दही व घी से बने खाद्य पदार्थों का पूरी तरह त्याग रखा गया। व्रतियों ने बाजरे की रोटी, मक्की और भैंस के दूध या अंकुरित अनाज का ही उपयोग किया।
संस्कृति और गो-सेवा का संदेश
वरिष्ठ नागरिकों के अनुसार, बछ बारस का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारी प्राचीन संस्कृति, गो-सेवा और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाने का एक सशक्त माध्यम है। यह पर्व भावी पीढ़ी को पशु-पक्षियों और पर्यावरण के प्रति दया भाव रखने की प्रेरणा देता है। दिनभर चले पूजा-अर्चना के दौर के बाद शाम को महिलाओं ने कथा सुनकर और सूर्य देव को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया।

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