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कस्बाई लोकतंत्र का सबक: जब नगर सोता है, तब कस्बा जागता है!
By Lokjeewan Daily - 12-09-2026


- लोकेश सोनी-
भीलवाड़ा लोकजीवन। लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसकी जड़ें महलों या बहुमंजिला इमारतों में नहीं, बल्कि ज़मीन से जुड़े कस्बों और चौपालों में सांस लेती हैं। शुक्रवार को भीलवाड़ा जिले की 9 नगरपालिकाओं में संपन्न हुआ मतदान सिर्फ एक चुनावी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि शहरी उदासीनता पर कस्बाई जागरूकता का एक मौन और सशक्त प्रहार था। महज 48 घंटे पहले भीलवाड़ा नगर निगम के चुनाव में दर्ज हुआ 63.84 फीसदी का निराशाजनक मतदान आंकड़ा यह बताने के लिए काफी था कि तथाकथित पढ़ा-लिखा और साधन-संपन्न शहरी वर्ग मतदान के दिन भी छुट्टियों के आलस्य में डूबा रहा। वहीं दूसरी ओर, शुक्रवार को 9 नगरपालिकाओं में औसतन 84.21 प्रतिशत मतदान दर्ज कर ग्रामीण और कस्बाई मतदाताओं ने लोकतंत्र के वास्तविक नायक होने का प्रमाण दिया।
उत्साह की नई इबारत: नई पालिकाएं, नया विजऩ
विशेष रूप से बिजौलिया, बनेड़ा और पहली बार नगरपालिका बनी हमीरगढ़  जैसी नई पालिकाओं में 83 फीसदी से अधिक का मतदान यह साफ करता है कि जब जनता को अपने क्षेत्र के विकास की सीधी डोर अपने हाथ में दिखती है, तो वह मौसम, समय और काम-धंधे की परवाह किए बिना पोलिंग बूथ तक खिंची चली आती है। जहाजपुर में 87.60 प्रतिशत की रिकॉर्ड वोटिंग ने यह साबित किया कि स्थानीय राजनीति में आम आदमी की भागीदारी ही असल मायने में जनमत तय करती है। बनेड़ा के बूथ नंबर 7 पर बच्चों का अपनी उंगलियों पर स्याही लगवाने का वो मासूम हठ केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी में लोकतांत्रिक संस्कारों के रोपे जाने की जीवंत गवाही है।
ईवीएम में बंद भविष्य: गणित बिगाड़ेंगे निर्दलीय
अब जबकि 9 पालिकाओं के प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में लॉक हो चुका है, राजनीतिक दलों के थिंक-टैंक बंद कमरों में गणित बिगाडऩे और बनाने में लगे हैं। गंगापुर (86.60 प्रतिशत), मांडलगढ़ (85 प्रतिशत+) और आसींद में भारी मतदान प्रतिशत के चलते जीत-हार का अंतर बहुत बारीक रहने वाला है।
 दलगत निष्ठाओं से परे हटकर मतदाताओं ने जिस तरह निर्दलीयों और स्थानीय चेहरों पर भरोसा जताया है, उसने भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दलों के समीकरणों को हिला कर रख दिया है। 84.21 प्रतिशत का यह आंकड़ा उन तमाम नीति-निर्माताओं और शहरी नागरिकों के लिए एक आईना है जो लोकतंत्र की बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन मतदान के दिन मतदान केंद्र तक जाने का कष्ट नहीं उठाते। कस्बों के इन मतदाताओं का एक-एक वोट यह संदेश दे रहा है कि स्थानीय समस्याओं का समाधान घर बैठकर शिकायत करने से नहीं, बल्कि मतदान केंद्र पर जाकर अपनी उंगली पर स्याही का निशान लगवाने से ही संभव है। अब निगाहें परिणाम के उस दिन पर टिकी हैं जब ईवीएम खुलेगी और कस्बे यह तय करेंगे कि उनकी विकास की बागडोर किसके हाथों में होगी।

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