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भीलवाड़ा लोकजीवन (लोकेश सोनी )। बच्चों में डायबिटीज का खतरा बढ़ रहा है। प्रतिमाह अस्पतालों में नए केस बढ़ रहे हैं। इसे रोक पाना चुनौती साबित हो रही है। जिससे बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ी है। महात्मा गांधी अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. कुलदीप सिंह राजपूत ने बताया कि 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चे डायबिटीज का शिकार हो रहे हैं। इसमें ज्यादातर बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज मिल रही है, जो आनुवांशिक कारणों से होना माना जा रहा है। इसकी चपेट में ज्यादातर बच्चे 2 से 10 वर्ष आयु के हैं। कई बड़े बच्चों में टाइप 2 डायबिटीज भी मिल रही है। इसकी वजह खानपान और बिगड़ी जीवनशैली माना जा रहा है। हालांकि अस्पताल आने वाले ज्यादातर बच्चे डायबिटीज टाइप 1 से ग्रस्त है। चिकित्सकों के अनुसार टाइप 1 डायबिटीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे का शरीर इंसुलिन हार्मोन का उत्पादन नहीं कर पाता है। बच्चे के जीवित रहने से लेकर शरीर के अंगों को ठीक से काम करते रहने के लिए इस हार्मोन की आवश्यकता होती है। शरीर में इसका उत्पादन न हो पाने की स्थिति में ऐसे रोगियों को जीवनभर इंसुलिन का इंजेक्शन लगाते रहने की आवश्यकता होती है। इसका संपूर्ण इलाज नहीं है, इसे केवल प्रबंधित किया जा सकता है। ऐसे में पेरेंट्स को बच्चे के खानपान, जीवनशैली और स्वास्थ्य पर पूरी नजर रखनी चाहिए। चिकित्सकों के अनुसार टाइप 1 डायबिटीज के कारण बच्चे को सामान्य से अधिक प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, वजन कम होना, थकान और कमजोरी, चिड़चिड़ापन या व्यवहार में परिवर्तन, थकान, धुंधला दिखाई देना, त्वचा पर काले धब्बे, बार-बार संक्रमण होना, घावों का जल्दी ठीक न होना आदि हो सकते हैं।
गर्भावस्था में शुगर को नियंत्रित रखे
ज्यादातर बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज फैमिली हिस्ट्री की वजह से होती है। बच्चों की जांच कराते रहे। गायनिक चिकित्सक नवीन भडाणा व मुकेश सुवालका बताते है कि पहले से डायबिटीज महिला गर्भावस्था में शुगर व बच्चे के वजन को कंट्रोल रखे। लापरवाही न बरतें।
गंभीर हालत में पहुंच रहे बच्चे
शिशु रोग चिकित्सक डॉ. मोनिका सिंह ने बताया कि बच्चों में डायबिटिक के केस आ रहे हैं। कई बार बच्चें को गंभीर हालत में अस्पताल लाया जाता है। इसकी वजह इलाज में लापरवाही है। इस लापरवाही से बच्चे की जान खतरे में पड़ सकती है। परिजन को लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। समय पर और पूरा इलाज लेना चाहिए।
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