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Update Google Chromeब्रेकिंग न्यूज़
- श्मशान घाट बना अव्यवस्थाओं का प्रतीक
- कीचड़ के बीच अंतिम विदाई को मजबूर ग्रामीण
भीलवाड़ा। कहते हैं मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है और हर इंसान को सम्मानजनक अंतिम विदाई मिलनी चाहिए, लेकिन मांडलगढ़ विधानसभा क्षेत्र के ग्राम पंचायत आंमामें यह सम्मान आज भी अधूरा है। यहां हालात ऐसे हैं कि मौत के बाद भी इंसान को सुकून नसीब नहीं होता। गांव का श्मशान घाट बदहाली, गंदगी और अव्यवस्थाओं का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है, जहां अपनों को अंतिम विदाई देने पहुंचे परिजनों और ग्रामीणों को नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। गांव का श्मशान घाट वर्षों से बदहाली की मार झेल रहा है। यहां मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि श्मशान घाट पर लगाए गए टीन शेड तक गायब हो चुके हैं, जिससे बारिश के मौसम में अंतिम संस्कार करना लगभग असंभव हो जाता है। मजबूरी में ग्रामीण तिरपाल लगाकर, भीगते हुए दाह संस्कार करने को विवश हैं। श्मशान घाट तक पहुंचने वाला रास्ता कीचड़ और गंदगी से भरा पड़ा है। तालाब की पाल पर फैली गंदगी और उससे उठती दुर्गंध के कारण अंतिम संस्कार में शामिल लोगों का बैठना तक मुश्किल हो जाता है। कटीली झाडय़िों और कचरे के ढेर के बीच बैठकर लोग शोक की घडय़िां काटने को मजबूर हैं। न बैठने की व्यवस्था है, न छाया और न ही स्वच्छ वातावरण। हाल ही में आंमा निवासी गणेश लाल जरवाल के निधन पर गांव सहित आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग अंतिम संस्कार में शामिल हुए। इस दौरान श्मशान घाट की बदहाली को देखकर लोगों में भारी आक्रोश देखने को मिला। ग्रामीणों का कहना है कि शोक की घड़ी में जहां संवेदनशीलता और सुविधा होनी चाहिए, वहां अव्यवस्थाएं पीड़ा को और बढ़ा देती हैं। ग्रामवासी एवं एडवोकेट बालकृष्ण पुरोहित ने बताया कि वे कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को इस गंभीर समस्या से अवगत करा चुके हैं, लेकिन अब तक स्थिति जस की तस बनी हुई है। उन्होंने कहा कि अंतिम संस्कार के समय परिजनों की पीड़ा अव्यवस्थाओं के कारण कई गुना बढ़ जाती है। वहीं गांव के प्रबुद्ध नागरिक बालकिशन पुरोहित, सुखदेव जरवाल और राधेश्याम तेली सहित दर्जनों ग्रामीणों ने श्मशान घाट की दुर्दशा पर गहरा रोष जताया है। ग्रामीणों का कहना है कि श्मशान तक जाने वाला मार्ग कीचड़ से भरा है, टीन शेड नहीं होने से बारिश में भारी परेशानी होती है, जबकि तालाब की पाल पर फैली गंदगी और बदबू से संक्रमण का खतरा बना रहता है। शोक संतप्त लोगों को कटीली झाडय़िों के बीच बैठना पड़ता है।
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2026-01-02 15:12:47