It is recommended that you update your browser to the latest browser to view this page.

Please update to continue or install another browser.

Update Google Chrome

युवाओं को संस्कारों से जोडऩा समय की सबसे बड़ी आवश्यकता - शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद जी तीर्थ महाराज
By Lokjeewan Daily - 29-05-2026

भीलवाड़ा लोकजीवन (दिलीप सोनी)। ज्योतिर्मठ अवांतुर भानपुरा पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद जी तीर्थ महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में सनातन धर्म के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती युवाओं का अपनी संस्कृति और मूल्यों से दूर होना है। उन्होंने कहा कि यदि बच्चों और युवाओं को बचपन से ही धर्म, संस्कार, गौ सेवा, गुरु परंपरा और भारतीय संस्कृति से जोड़ा जाए तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव है। हरिसेवा उदासीन आश्रम सनातन मंदिर में आयोजित भक्तमाल कथा के दौरान लोकजीवन से विशेष साक्षात्कार में शंकराचार्य महाराज ने समाज, धर्म, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विभिन्न विषयों पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भक्तमाल कथा का मुख्य उद्देश्य संतों के जीवन चरित्र के माध्यम से समाज में भक्ति, सेवा और सदाचार की भावना जागृत करना है। संत परंपरा सदैव समाज को दिशा देने का कार्य करती रही है तथा भारत की आध्यात्मिक चेतना को जीवित रखने में संतों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

प्रश्न - वर्तमान समय में आध्यात्मिकता की क्या आवश्यकता है?
उत्तर - आज का जीवन तनाव, प्रतिस्पर्धा और भौतिकता से घिरा हुआ है। ऐसे समय में आध्यात्मिकता ही मनुष्य को मानसिक शांति और आत्मबल प्रदान करती है। केवल पूजा-पाठ ही नहीं, बल्कि निष्काम कर्म, सेवा और भक्ति भी मोक्ष के लिए समान रूप से आवश्यक हैं।

प्रश्न -सोशल मीडिया और आधुनिक तकनीक को आप किस रूप में देखते हैं?
उत्तर - यदि आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया का सदुपयोग किया जाए तो यह धर्म प्रचार और संस्कृति संरक्षण का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। संत समाज को भी समय के अनुसार आधुनिक माध्यमों का उपयोग कर युवाओं तक पहुंचना चाहिए।

प्रश्न -  गौ सेवा और भारतीय संस्कृति को लेकर आपका क्या संदेश है?
उत्तर - गौ सेवा भारतीय संस्कृति की आत्मा है। गौ माता केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन पद्धति और कृषि संस्कृति का आधार हैं। परिवारों में बढ़ती दूरियों और संस्कारों के क्षरण पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि संयुक्त परिवार व्यवस्था, नियमित सत्संग, धार्मिक आयोजन और माता-पिता का आदर्श आचरण ही संस्कारों को बचा सकता है।

प्रश्न - भारत को पुन: विश्वगुरु बनाने में संत समाज की क्या भूमिका है?
उत्तर - संत समाज समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता और राष्ट्रभक्ति का भाव जागृत कर सकता है। अधिकमास एवं पुरुषोत्तम मास आत्मशुद्धि, साधना, दान, जाप और भगवान की भक्ति का विशेष काल है। कथा श्रवण से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है और मन शुद्ध होता है। केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं, बल्कि ज्ञान के साथ भक्ति और सेवा का समन्वय भी आवश्यक है।

प्रश्न - शिक्षा और संस्कारों को लेकर आपका क्या दृष्टिकोण है?
उत्तर - शक्षा व्यवस्था में आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा को आवश्यक बनाया जाना चाहिए। यदि बच्चों को भारतीय संस्कृति और संस्कारों का ज्ञान दिया जाए तो भविष्य में सशक्त राष्ट्र का निर्माण होगा। भारतीय परिवार व्यवस्था और संस्कारों को जीवित रखने में मातृशक्ति की सबसे बड़ी भूमिका है।

प्रश्न - पर्यावरण संरक्षण को धर्म से कैसे जोड़ते हैं?
उत्तर - भारतीय संस्कृति में वृक्ष, नदियों, पर्वत और प्रकृति की पूजा की परंपरा रही है। इसलिए प्रकृति संरक्षण भी धर्म का ही एक अंग है।
 प्रश्न - हिंदुत्व और राष्ट्र निर्माण को लेकर आपका क्या संदेश है?
उत्तर - हिंदुत्व किसी के विरोध का नहीं, बल्कि मानवता, संस्कृति और सनातन मूल्यों के संरक्षण का मार्ग है। संत समाज सदैव राष्ट्रहित, संस्कृति संरक्षण और समाज जागरण के लिए कार्य करता रहेगा। अंत में शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद जी तीर्थ महाराज ने देशवासियों से धर्म, संस्कृति, गौ सेवा, राष्ट्रभक्ति और मानवता के मार्ग पर चलने का आह्वान करते हुए कहा कि जब समाज संस्कारित और संगठित होगा, तभी भारत पुन: विश्वगुरु बन सकेगा।

अन्य सम्बंधित खबरे