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- महात्मा गांधी अस्पताल के आंकड़े दे रहे गवाही, लाखों में कुछ लोग ही छोड़ पा रहे जानलेवा लत
- लोकेश सोनी -
भीलवाड़ा लोकजीवन। चारों तरफ उड़ता बीड़ी-सिगरेट का धुआं, थूक से लाल होती दीवारें और गुटखे के पाउच से सजती दुकानें— यह नजारा बताने के लिए काफी है कि हमारा समाज किस कदर मौत के सामान को गले लगाए बैठा है। महात्मा गांधी अस्पताल की नशामुक्ति ओपीडी से जो आंकड़े सामने आए हैं, वे कोई जश्न मनाने वाले नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत बयां कर रहे हैं। लाखों की आबादी वाले इस क्षेत्र में तंबाकू की लत से पूरी तरह पीछा छुड़ाने वालों की संख्या ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। लोग तंबाकू खाकर खुद अपने हाथों से अपनी कफन सिल रहे हैं। अस्पताल के आंकड़े यह नहीं दिखाते कि कितने लोग सुधर गए, बल्कि यह बताते हैं कि तंबाकू का जाल कितना गहरा है कि लोग चाहकर भी इससे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। साल 2025 में सिर्फ 333 लोग अस्पताल तक पहुंच पाए। इसका सीधा और डरावना मतलब यह है कि बाकी के हजारों-लाखों लोग आज भी गुटखे और सिगरेट के जरिए हर दिन कैंसर, हार्ट अटैक और गैंग्रीन जैसी बीमारियों को खुद के शरीर में पाल रहे हैं। इस साल 2026 के शुरुआती चार महीनों में भी केवल 103 लोग ही जाग पाए हैं, बाकी जनता अब भी गहरी नींद में मौत का इंतजार कर रही है।
जबड़े गल रहे, सांसें थम रही हैं... कब जागेंगे हम
अस्पताल के विशेषज्ञों की मानें तो स्थिति बेहद भयावह है। जो लोग समय पर अस्पताल नहीं आ रहे हैं, उनका अंत बेहद दर्दनाक हो रहा है। ओपीडी में ज्यादातर लोग तब आते हैं जब उनका मुंह खुलना बंद हो जाता है, या डॉक्टर कैंसर का अंदेशा जता देते हैं। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। तंबाकू सिर्फ एक इंसान को नहीं मारता, बल्कि इलाज के खर्च में पूरा परिवार कर्ज के दलदल में डूबकर बर्बाद हो जाता है। आंकड़ों में मामूली बढ़ोतरी यह दर्शाती है कि समाज में तंबाकू कंपनियों का शिकंजा हमारी जागरूकता से कहीं ज्यादा मजबूत है।
लत या जिंदगी... फैसला आपका
गुटखे का हर एक पाउच और सिगरेट की हर एक फूंकी आपके बच्चों के अनाथ होने की तारीख को नजदीक ला रही है। अगर इन आंकड़ों को देखने के बाद भी आपकी आत्मा नहीं कांपी और आप महात्मा गांधी अस्पताल के नशामुक्ति केंद्र नहीं पहुंचे, तो यकीन मानिए, अगली बार अस्पताल की ओपीडी की लिस्ट में नहीं, बल्कि कफन में लिपटी लाशों की लिस्ट में आपका नाम हो सकता है। तय आपको करना है— लत या जिंदगी?
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