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जीवंत हुईं कबीर वाणी; डॉ. चेतना ने रायगढ़ घराने की तकनीकी बारीकियों से मोहा मन
By Lokjeewan Daily - 16-07-2026

जयपुर। कला और संस्कृति के जीवंत केंद्र जवाहर कला केंद्र (JKK) में 14 से 16 जुलाई तक आयोजित तीन दिवसीय 'कथक गुरु पंडित कुंदनलाल गंगानी जन्मशती समारोह' इन दिनों कला प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। समारोह के प्रथम दिन जहाँ दर्शकों को जयपुर और लखनऊ घराने की साझी विरासत व जुगलबंदी देखने को मिली, वहीं बुधवार को दूसरे दिन का आकर्षण बिल्कुल जुदा रहा। इस विशेष शाम दर्शकों को रायगढ़ और जयपुर घराने की समृद्ध परंपराओं का एक अनूठा व दुर्लभ संगम देखने को मिला। राजधानी के सांस्कृतिक पटल पर सजी इस बेहद अनूठी संध्या में कथक नृत्य और संत कबीर के आध्यात्मिक दर्शन का एक विहंगम सामंजस्य देखने को मिला। प्रख्यात नृत्यांगना डॉ. चेतना ने जब 'कबीर वाणी' को कथक के माध्यम से मंच पर उतारा, तो दर्शक भाव-विभोर हो उठे। कलाकारों के सधे हुए कदमों, अद्भुत भाव-भंगिमाओं और इस मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुति ने दर्शकों के मन-मयूर को उल्लास से भर दिया। पूरे ऑडिटोरियम ने दिल खोलकर और करतल ध्वनि (तालियों की गड़गड़ाहट) के साथ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। 


आमतौर पर कथक में पारंपरिक ठुमरी या कृष्ण लीलाओं के पदों पर भाव दिखाए जाते हैं, लेकिन डॉ. चेतना ने इस बार लीक से हटकर कबीरदास जी के भजनों और साखियों को अपनी नृत्य शैली का आधार बनाया। कबीर के गूढ़ आध्यात्मिक संदेशों को उन्होंने अपने अंग-संचालन, हस्तक और मुखाभिनय के जरिए इतनी सरलता से पेश किया कि दर्शक मंत्रमुग्ध रह गए।

प्रस्तुति के दौरान डॉ. चेतना ने केवल भाव पक्ष ही नहीं, बल्कि कथक के तकनीकी पक्ष पर भी अपनी मजबूत पकड़ का परिचय दिया। उन्होंने कथक के प्रसिद्ध 'रायगढ़ घराने' की उन सूक्ष्म तकनीकी विशेषताओं और जटिल पदचाप (footwork) को मंच पर जीवंत किया, जो इस घराने को बेहद खास और कठिन बनाती हैं। लय-ताल की उलझी हुई कड़ियों और द्रुत गति के चक्करों को उन्होंने बेहद खूबसूरती और सफाई के साथ प्रदर्शित किया।

इस शानदार प्रस्तुति में मंच पर डॉ. चेतना के साथ उनके सह-नर्तकों और शिष्यों की टोली ने भी एक सुंदर तालमेल दिखाया। श्वेत और लाल रंग की पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकारों ने जब मंच पर सामूहिक रूप से विभिन्न मुद्राओं और चक्करों का प्रदर्शन किया, तो पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
यह आयोजन न केवल कला प्रेमियों के लिए एक विजुअल ट्रीट साबित हुआ, बल्कि इसने यह भी दिखाया कि कैसे शास्त्रीय नृत्य के माध्यम से कबीर जैसे महान संतों की सूफियाना सोच को आज की पीढ़ी तक नए ढंग से पहुंचाया जा सकता है।

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