
It is recommended that you update your browser to the latest browser to view this page.
Please update to continue or install another browser.
Update Google Chromeब्रेकिंग न्यूज़
राजसमंद लोकजीवन। कांकरोली स्थित पुष्टिमार्गीय तृतीय पीठ प्रन्यास द्वारकाधीश मंदिर में मंगलवार सायंकाल आरती के समय गोवर्धन पूजा चौक में परंपरागत च्राल दर्शन हुए। फागुन माह में होने वाले इन विशेष दर्शनों को देखने के लिए नगर सहित बाहर से भी सैकड़ों वैष्णव मंदिर पहुंचे। पुष्टिमार्गीय मंदिरों में चल रहे चालीस दिवसीय फागुन उत्सव के दौरान कुल आठ च्राल दर्शनज् आयोजित होते हैं। मंदिर अधिकारी जयेश भाई शाह ने बताया कि पुष्टिमार्ग भावना प्रधान संप्रदाय है, जहां आरती केवल विधि नहीं, बल्कि प्रभु प्राप्ति की उत्कट आर्ति (आकुल पुकार) का प्रतीक है। च्आरतीज् शब्द संस्कृत के च्आरात्रिकज् से निकला है, जिसका भावार्थ पीड़ा या संकट निवारण के लिए प्रभु की पुकार माना जाता है। आरती के समय बड़ी संख्या में व्रजभक्त प्रभु के सान्निध्य के लिए उमड़ते हैं। भक्तों की इसी सामूहिक आर्ति और भाव-ताप को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए अग्नि पर राल डाली जाती है, जिससे लपटें ऊंचाई तक उठती हैं। उन्होंने बताया कि पुष्टिमार्ग की परंपराओं के पीछे व्यावहारिक और ऋतु-अनुकूल सोच भी रही है। वसंत ऋतु में दिन-रात के तापमान में अंतर और कफ की प्रधानता रहती है। राल की गर्म तासीर से वातावरण में उष्णता बढ़ती है, जो श्वसन तंत्र के लिए लाभकारी मानी जाती है। इसी परंपरा में वसंत में प्रभु को च्फगवाज् भी अर्पित किया जाता है।आयुर्वेद में राल को शुद्धिकरण, संतुलन और कायाकल्पकारी गुणों के लिए महत्व दिया गया है। पारंपरिक रूप से इसका उपयोग धूप, औषधियों और प्राकृतिक उपचारों में किया जाता रहा है। त्वचा संबंधी समस्याओं, घाव भरने, रक्तस्राव रोकने तथा शरीर को विषमुक्त रखने में राल के उपयोग का उल्लेख मिलता है। राल की सुगंध शांति और एकाग्रता बढ़ाने में भी सहायक मानी जाती है।फागुन के इन अलौकिक च्राल दर्शनोंं के साथ द्वारकाधीश मंदिर में भक्तिभाव और उत्सव का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है।