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- सर्राफा बाजार में रहा लोगों का जमावड़ा
- 200 सालों से चली आ रही परंपरा
भीलवाड़ा लोकजीवन। कड़ाव में भरे रंगीन पानी से डोलचे मारते पुरुष व उन पर कोड़ों की बौछार करती महिलाएं। ढोल व डीजे पर नाचते युवा व मस्ती में सराबोर पुरुष। यह दृश्य था रंग तेरस पर गुरुवार दोपहर गुलमंडी स्थित सर्राफा बाजार में जीनगर समाज की रंग कोड़ा मार होली का। कड़ाव में चार राउंड में हजारों लीटर पानी, रंग व गुलाब के फूलों की पत्तियां डालकर घंटों तक कोड़ामार होली का आनंद लिया। करीब 200 साल से हो रहे इस अनूठे पारंपरिक आयोजन को देखने के लिए सर्राफा बाजार में लोग जमा थे। सुबह करीब 11 बजे सर्राफा बाजार में जीनगर समाज समिति के तत्वावधान में पानी के बड़े कड़ाव में गुलाबी रंग घोला गया। महिलाएं कड़ाव की सुरक्षा के लिए कपड़े के कोड़े लेकर खड़ी हो गई। युवा डोलची से रंगीन पानी से महिलाओं पर बौछार करने लगे। महिलाओं ने पानी की सुरक्षा कर उन पर जमकर कोड़े बरसाए। कार्यक्रम दोपहर दो बजे तक चला। कोड़ामार होली देखने के लिए मकानों की छतों एवं मुख्य मार्ग के दोनों ओर दर्शकों का जमावड़ा लगा रहा। भोपालगंज, शास्त्रीनगर, बापूनगर, आरके, आरसी व्यास कॉलोनी, सुभाषनगर, चंद्रशेखर आजादनगर सहित अन्य कॉलोनियों व बस्तियों के लोग भी सर्राफा बाजार में जमा थे। कोड़ामार होली खेलने के बाद समाज के लोग व महिलाएं ढोल की थाप पर नाचते-गाते नागौरी गार्डन स्थित समाज के नोहरा पहुंचे, जहां एक-दूसरे को होली की शुभकामनाएं दी गई। महिलाओं ने होली गीतों की प्रस्तुति दी। शाम को सामूहिक स्नेहभोज होगा।
वीरांगनाओं के बलिदान की याद में खेलते हैं होली
समाजजनों के अनुसार वर्ष 1568 में चित्तौडग़ढ़ के किले पर अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया, तब चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को महारानी पद्मिनी ने हजारों वीरांगनाओं के साथ अपने स्वाभिमान व सतित्व की रक्षा के लिए जौहर किया था। दो दिन बाद तेरस के दिन क्षत्रियों ने किले व मातृभूमि की रक्षा के लिए केसरिया बाना पहनकर शाका किया, जिसे इतिहास में खून की होली के नाम से जाना जाता है। उन्हीं वीरांगनाओं के बलिदान को याद करते हुए मेवाड़ में रंग तेरस पर्व मनाया जाता है। इसके तहत भीलवाड़ा में भी जीनगर समाज करीब 200 साल से कोड़ामार होली का आयोजन कर रहा है, जिसमें विशेषकर नव विवाहित जोड़े शामिल होते है।
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