डिजिटल दौर में सिमटी खाता-बही, दीपावली पर आज भी कायम है परंपरा
- तकनीक के बीच आस्था की अनूठी मिसाल - नई पीढ़ी भी निभा रही है विरासत
भीलवाड़ा लोकजीवन न्यूज। आधुनिक तकनीक और डिजिटल युग ने व्यापारिक कामकाज के तौर-तरीके भले ही पूरी तरह बदल दिए हों, लेकिन संस्कृति और परंपराओं की जड़ें आज भी उतनी ही गहरी हैं। एक समय था जब व्यापार का संपूर्ण लेखा-जोखा कागजों के पन्नों पर दर्ज होता था। किससे कितना लेना है, किसे कितना देना है और किस पार्टी का कितना बकाया है—इन सबका हिसाब पारंपरिक खाता-बही में संभालकर रखा जाता था। वक्त के साथ तकनीक आगे बढ़ी और मोबाइल, कंप्यूटर तथा विभिन्न सॉफ्टवेयर ने इन पुराने बहीखातों की जगह ले ली। इसके बावजूद, दीपावली के पावन पर्व पर भीलवाड़ा समेत पूरे राजस्थान के बाजारों में खाता-बही की खरीद और इसकी पूजा की परंपरा आज भी पूरी शिद्दत के साथ कायम है। आज के इस दौर में व्यापारिक प्रतिष्ठानों और कॉर्पोरेट जगत में डिजिटल बहीखातों का बोलबाला है। एक क्लिक पर सालभर का हिसाब मिल जाता है। बावजूद इसके, दीपावली के दिन बहीखाता खरीदने और उस पर रोली से शुभ-लाभ लिखकर नए साल के हिसाब की शुरुआत करने की परंपरा आज भी जीवित है। शहर के प्रमुख बाजारों में दीपावली से पहले लाल कपड़े में लिपटी इन खाता-बही को खरीदने के लिए व्यापारियों की खासी भीड़ देखने को मिलती है।वरिष्ठ व्यापारियों का कहना है कि तकनीक कितनी भी आगे क्यों न बढ़ जाए, लेकिन हाथ से लिखे गए पहले पन्ने की जो पवित्रता है, उसका मुकाबला डिजिटल एक्सेल शीट नहीं कर सकती। यही वजह है कि आज की युवा पीढ़ी भी अपने बुजुर्गों के दिखाए मार्ग पर चलते हुए इस परंपरा को पूरी श्रद्धा से आगे बढ़ा रही है। दीपावली की रात महालक्ष्मी पूजन के साथ नए बहीखातों का पूजन व्यापार में बरकत और सफलता का प्रतीक माना जाता है। डजिटल दौर की रफ्तार के बीच खाता-बही की यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता चाहे जितनी भी तरक्की कर ले, हमारी सांस्कृतिक आस्थाएं और परंपराएं हमारे व्यापारिक और सामाजिक जीवन का आधार बनी रहेंगी।
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